कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

October 16, 2006

अँगड़ाई पर अँगड़ाई लेती है रात जुदाई की

अँगड़ाई पर अँगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानों बात मेरी तन्हाई की

कौन सियाही घोल रहा था वक्त के बहते दरिया में
मैनें आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की

(सियाही : ink; हरजाई : oppressor, tyrant)

वस्ल की रात ने जाने क्यूँ इसरार था उनको जाने पर
वक्त से पहले डूब गये, तारों ने बड़ी दानाई की

(वस्ल : meeting; इसरार : insistence; दानाई : wisdom, knowledge)

उड़ते उड़ते आस का पँछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते रोते बैठ गयी आवाज़ किसी सौदाई की

(उफ़क़ : horizon; सौदाई : melancholic, madman)

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