कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

October 16, 2006

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे।
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे।

ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना
पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे।

आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आँसू मेरे दामन पर बिखर जाने दे।

ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे।


माज़ी = Past

1 Comment »

  1. ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको
    सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे।

    these line are marvelous…… and jagjeet singh’s voice toooooooo gud

    Comment by jaya — April 4, 2008 @ 2:36 pm | Reply


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