आप से गिला आप की क़सम
सोचते रहें कर न सके हम
उस की क्या ख़ता लदवा है गम़
क्यूं गिला करें चारागर से हम
ये नवाज़िशें और ये करम
फ़र्त-व-शौक़ से मर न जाएं हम
खेंचते रहे उम्र भर मुझे
एक तरफ़ ख़ुदा एक तरफ़ सनम
ये अगर नहीं यार की गली
चलते चलते क्यूं स्र्क गए क़दम



words r not visible do the needful as early as possible…………
take it as a serious one
Comment by shalini — दिसम्बर 18, 2006 @ 5:38 अपराह्न |