कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

November 1, 2006

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बाहज़ारां इज़्तिराब-ओ-सदहज़ारां इश्तियाक
तुझसे वो पहले पहल दिल का लगाना याद है

(बाहज़ारां == thousand times, इज़्तिराब == anxiety, सदहज़ारां == once / ek baar, इश्तियाक == meeting)

तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

(बेबाक = outspoken)

खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़्फ़ातन
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छिपाना याद है

(दफ़्फ़ातन == suddenly)

जानकर सोता तुझे वो क़सा-ए-पाबोसी मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है

(क़सा-ए-पाबोसी = attempt to kiss the feet)

तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है

(अज़्राह-ए-लिहाज़् == with caution)

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना ना था
सच कहो क्या तुम को भी वो कारखाना याद है

(कारखाना == age / time)

ग़ैर की नज़रों से बचकर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तेरा चोरीछिपे रातों को आना याद है

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है

(वस्ल == date / meeting, ज़िक्र-ए-फ़िराक़ == mention of seperation)

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

(कोठे पे == on the terrace)

देखना मुझको जो बर्गश्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

(बर्गश्ता = रूठा हुआ)

चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

बेरुख़ी के साथ सुनाना दर्द-ए-दिल की दास्तां
और तेरा हाथों में वो कंगन घुमाना याद है

वक़्त-ए-रुख़सत अलविदा का लफ़्ज़ कहने के लिये
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है

बावजूद-ए-इद्दा-ए-इत्तक़ा ‘हसरत’ मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का ये फ़साना याद है

(बावजूद = Inspite of, इद्दा-ए-इत्तक़ा = vow of piety, अहद-ए-हवस = sensuous days)

2 Comments »

  1. jo bhi ho…..sach hai……..
    dil mein jhank ke to dekho…..
    aaj bhi uska wo muskurana yaad hai…..

    Comment by sonia — March 23, 2007 @ 5:12 pm | Reply

  2. Subhaan Allaah

    Comment by Rishi — May 3, 2007 @ 11:57 am | Reply


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