जाना है जाना है चलते ही जाना है
ना कोई अपना है ना ही ठिकाना है
सब रास्ते नाराज़ हैं
मन्ज़िल की आहटों से राही बेगाना है
जाना है जाना है चलते ही जाना है
क्या कभी साहिल भी तूफ़ान में बहते हैं
सब यहाँ आसान है हौसले कहते हैं
शोलों पे कांटों पे हँस के चल सकते हैं
अपनी तक्दीरों को हम बदल सकते हैं
बिगडे हालातों में दिल को समझाना है
जाना है जाना है चलते ही जाना है
ख्वाबों की दुनिया में यादों के रेले में
आदमी तन्हा है भीड में मेले में
ज़िन्दगी में ऐसा मोड भी आता है
पाँव रुक जाते हैं वक़्त थम जाता है
ऐसे में तो मुश्किल आगे बढ पाना है
जाना है जाना है चलते ही जाना है




ab kya bolein wah manzil ki itni nadik ho kar bhi chalte hi jana hai
Comment by mehek — November 28, 2007 @ 2:15 pm |