सोचा नहीं अच्छा-बुरा, देखा-सुना कुछ भी नहीं..
मांगा खुदा से रात-दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं..
देखा तुझे, सोचा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे..
मेरी खता मेरी वफ़ा, तेरी खता कुछ भी नहीं..
जिस पर हमारी आंख ने मोती बिछाये रात-भर..
भेजा उन्हे कागज़ वोही, लिखा मगर कुछ भी नहीं..
एक शाम की दहलीज पर, बैठे रहे वो देर तक..
आंखों से की बातें बहुत, मुह से कहा कुछ भी नहीं..




bhut hi achi ghazal hai ye. jagjit ji ne aur chitra ji ne bhut dil se gaayi thi.
kya aap fourth sher ek bar check ker lenge. shayd fourth sher kuch ese hai……
जिस पर हमारी आंख ने मोती बिछाये रात-भर..
भेजा वोही कागज़ उन्हे,उसमें लिखा कुछ भी नहीं…
with regards
hemjyotsna
hemjyotsana.wordpress.com
Comment by hemjyotsana parashar — May 21, 2007 @ 2:30 pm |