कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

September 17, 2007

मान मौसम का कहा

मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा,
आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा,

ऐ मेरे यार तुझे उसकी कसम देता हूँ,
भूल जा शिकवे गिले हाथ मिला जाम उठा,

एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा,
देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा,

प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ,
मयकदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा,

कौन आएगा यहाँ

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा,
मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा,

दिल-ऐ-नादान न धड़क ऐ दिल-ऐ-नादान न धड़क,
कोई खत लेके पड़ोसी के घर आया होगा,

गुल से लिपटी हुयी तितली को गिराकर देखो,
आंधीयों तुमने दरख्तों को गिराया होगा,

‘कैफ़’ परदेस में मत याद करो अपना मकान,
अबके बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा,

बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है

बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है,
जो रोज भेष बदल कर मेरी तलाश में है,

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है,
दुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है,

मैं देवता की तरह कैद अपने मन्दिर में,
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है,

मैं जिसके हाथ में एक फूल देके आया था,
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है,

फिर से मौसम बहारों का आने को है

Filed under: Albums, Ghazal, Jagjit Singh, Visions, गज़ल, जगजीत सिहँ — Amarjeet Singh @ 5:32 pm

फिर से मौसम बहारों का आने को है,
फिर से रंगीन ज़माना बदल जायेगा,
अबकी बज़्म चरागों सजा लेंगे हम,
ये भी अरमान दिल का निकल जायेगा,

आप करदे जो मुझको निगाहें करम,
मेरी उल्फत का रह जायेगा कुछ भरम,
यूं फ़साना तो मेरा रहेगा यही,
सिर्फ़ उनवान उसका बदल जायेगा,

फीकी फीकी सी क्यूँ शाम-ऐ-मएखाना है,
लुत्फ़ साकी भी कम खाली पैमाना है,
अपनी नज़रों से ही कुछ पिला दी जिए,
रंग महफिल का ख़ुद ही बदल जायेगा,

मेरे मिटने का उनको ज़रा गम नहीं,
जुल्फ भी उनकी ऐ दोस्त वार हम नहीं,
अपने होने न होने से होता है क्या,
काम दुनिया का यु ही तो चल जायेगा,

आपने दिल जो ज़ाहिद का तोडा तो क्या,
आपने उसकी दुनिया को छोड़ा तो क्या,
आप इतने तो आख़िर परेशान न हों,
वो संभलते संभलते संभल जायेगा,

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