जिस मोड़ पर किए थे हम इन्तेजार बरसों,
उससे लिपट के रोये दीवाना-वार बरसों,
तुम गुलसितां से आए ज़िक्र खिज़ां हिलाए,
हमने कफ़स में देखी फासले बहार बरसों,
होती रही है यूं तो बरसात आसुओं की,
उठते रहे हैं फिर भी दिल से गुबार बरसों,
वो संग-ऐ-दिल था कोई बेगाना-ऐ-वफ़ा था,
करते रहें है जिसका हम इंतजार बरसों,
मुझे गुसा दिखाया जा रहा है,
तबस्सुम को दबाया जा रहा है,
वहाँ तक आबरू जब्त-ऐ-गम है,
जहाँ तक मुस्कुराया जा रहा है,
दो आलम मैंने छोडे जिसके खातिर,
वही दामन छुडाया जा रहा है,
क़रीब आने में है उनको तकल्लुफ,
वहीँ से मुस्कुराया जा रहा है,
मेरे क़रीब न आओ के मैं शराबी हूँ,
मेरा शवों जगाओ के मैं शराबी हूँ,
ज़माने भर के निगाहों से गिर चुका हूँ मैं,
नज़र से तुम न गिराओ के मैं शराबी हूँ,
ये अर्ज़ करता हूँ गिर कर खुलुश वालों से,
उठा सको तो उठाओ के मैं शराबी हूँ,
तुम्हारी आँख से भर लूँ सुरूर आंखों में,
नज़र नज़र से मिलाओ के मैं शराबी हूँ,