श्याम चरण मन भाये |
उठत-बैठत जागत-सोवत,
हरि छबि सदा सुहाये |
इत-उत- पल-पल छिन-छिन देखूँ,
चंद्र रूप मुस्काये |
बंद करूँ जो अंखियन आपन,
हिय नैनन दरषाये ||१||
अंग-अंग ते रोम-रोम में,
श्यामल छबि हरषाये |
‘दास नारायण’ जनम सुफल भयो,
दोउ लोक बन जाये ||२||



