आज मैंने अपना फिर सौदा किया,
और फिर में दूर से देखा किया,
जिन्दगी भर मेरे कम आए उसूल,
एक एक करके उन्हें बेचा किया,
कुछ कभी अपनी वफाओ मे भी थी,
तुमसे क्या कहते की तुमने क्या किया,
हो गई थी दिल को कुछ उम्मीद सी,
खैर तुमने जो किया अच्छा किया,
सितम्बर 22, 2007
आज मैंने अपना फिर सौदा किया
श्याम चरण मन भाये
श्याम चरण मन भाये |
उठत-बैठत जागत-सोवत,
हरि छबि सदा सुहाये |
इत-उत- पल-पल छिन-छिन देखूँ,
चंद्र रूप मुस्काये |
बंद करूँ जो अंखियन आपन,
हिय नैनन दरषाये ||१||
अंग-अंग ते रोम-रोम में,
श्यामल छबि हरषाये |
‘दास नारायण’ जनम सुफल भयो,
दोउ लोक बन जाये ||२||
हँस के बोला करो
हँस के बोला करो बुलाया करो,
आप का घर है आया जाया करो,
मुस्कराहट है हुस्न का जेवर,
मुस्कुराना न भूल जाया करो,
हद से बढ कर हसीन लगते हो,
झूठी कस्मे ज़रुर खाया करो,
सितम्बर 19, 2007
फिर नज़र से पिला दीजिये
फिर नज़र से पिला दीजिये,
होश मेरे उड़ा दीजिये,
छोडिये बर्ह्मी की रविश,
अब जरा मुस्कुरा दीजिये,
बात अफसाना बन जायेगी,
इस कदर मत हवा दीजिये,
आए खुलके मिलिये गले,
सब तकलुफ हटा दीजिये,
कब से मुश्ताके दीदार हु,
अब तो जलवा दिखा दीजिये,
तेरा चेहरा है आईने जैसा
तेरा चेहरा है आईने जैसा,
क्यो न देखू है देखने जैसा,
तुम कहो तो मैं पूछ लू तुमसे,
है सवाल एक पूछने जैसा,
दोस्त मिल जायेगे कई लेकिन,
न मिलेगा कोई मेरे जैसा,
तुम अचानक मिले थे जब पहले,
पल नही है वो भूलने जैसा,
काँटों से दामन उल्झाना मेरी आदत है
काँटों से दामन उल्झाना मेरी आदत है,
दिल मे पराया दर्द बसना मेरी आदत है,
मेरा गला अगर कट जाए तो मुझ पर क्या इल्जाम,
हर कातिल को गले लगना मेरी आदत है,
जिन को दुनिया ने ठुकराया जिन से है सब दूर,
एसे लोगो को अपनाना मेरी आदत है,
सब की बातें सुन लेता हु में चुप चाप मगर,
अपने दिल की करते जन मेरी आदत है,
घर से निकले थे हौसला करके
घर से निकले थे हौसला करके,
लौट आए खुदा खुदा करके,
हमने देखा है तज्रुबा करके,
जिन्दगी तो कभी नही आए,
मौत आए जरा जरा करके,
लोग सुनते रहे दिमाग की बात,
हम चले दिल को रहनुमा करके,
किसने पाया सुकून दुनिया मे,
ज़िन्दगानी का सामना करके,
मुस्कुरा कर मिला करो हमसे
मुस्कुरा कर मिला करो हमसे,
कुछ कहा और सुना करो हमसे,
बात करने से बात बढती है,
रोज बाते किया करो हमसे,
दुश्मनी से मिलेगा क्या तुमको,
दोस्त बनकर रहा करो हमसे,
देख लेते है सात पर्दो मे,
यु न परदा किया करो हमसे
सितम्बर 18, 2007
जिस मोड़ पर किए थे
जिस मोड़ पर किए थे हम इन्तेजार बरसों,
उससे लिपट के रोये दीवाना-वार बरसों,
तुम गुलसितां से आए ज़िक्र खिज़ां हिलाए,
हमने कफ़स में देखी फासले बहार बरसों,
होती रही है यूं तो बरसात आसुओं की,
उठते रहे हैं फिर भी दिल से गुबार बरसों,
वो संग-ऐ-दिल था कोई बेगाना-ऐ-वफ़ा था,
करते रहें है जिसका हम इंतजार बरसों,
मुझे गुसा दिखाया जा रहा है
मुझे गुसा दिखाया जा रहा है,
तबस्सुम को दबाया जा रहा है,
वहाँ तक आबरू जब्त-ऐ-गम है,
जहाँ तक मुस्कुराया जा रहा है,
दो आलम मैंने छोडे जिसके खातिर,
वही दामन छुडाया जा रहा है,
क़रीब आने में है उनको तकल्लुफ,
वहीँ से मुस्कुराया जा रहा है,



