कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

October 16, 2007

फिर उसी राहगुज़र पर शायद

फिर उसी राहगुज़र पर शायद,
हम कभी मिल सकें मगर शायद,

जान पहचान से क्या होगा,
फिर भी ऐ दोस्त गौर कर शायद,

मुन्तज़िर जिन के हम रहे उन को,
मिल गए और हमसफ़र शायद,

जो भी बिछडे हैं कब मिले हैं “फ़र्ज़”,
फिर भी तू इंतज़ार कर शायद,

1 Comment »

  1. जो भी बिछडे हैं कब मिले हैं “फ़र्ज़”,

    ये “फ़र्ज़” नहीं है, “फ़राज़” है… क्योंकि इसके शायर “अहमद फ़राज़” हैं… कृपया इसको ठीक कर दें |

    Comment by Neelabh — September 18, 2008 @ 7:12 pm | Reply


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