कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

October 17, 2007

जीते रहने की सज़ा दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी

जीते रहने की सज़ा दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,
अब तो मरने की दुआ दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,

मैं तो अब उकता गया हूँ क्या यही है कायेनात,
बस ये आइना हटा दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,

धुंडने निकला था तुझको और ख़ुद को खो दिया,
तू ही अब मेरा पता दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,

या मुझे अहसास की इस कैद से कर दे रिहा,
वर्ना दीवाना बना दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,

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