गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काटों से भी जीनत होती है,
जीने के लिए इस दुनिया मे गम की भी ज़रूरत होती है,
ऐ वाइज़-ऐ-नादान करता है तू एक क़यामत का चर्चा,
यहाँ रोज़ निगाहें मिलती हैं यहाँ रोज़ क़यामत होती है,
वो पुर्सिश-ऐ-गम को आये हैं कुछ कह न सकूं चुप रह न सकूं,
खामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दू तो शिकायत होती है,
करना ही पड़ेगा जब्त-ऐ-आलम पीने ही पड़ेंगे ये आंसू,
फरियाद-ओ-फुगान से ऐ नादाँ तौहीन-ऐ-मोहब्बत होती है,
जो आके रुके दामन पे सदा वो अश्क नहीं है पानी है,
जो अश्क न छलके आंखों से उस अश्क की कीमत होती है,



