कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

October 26, 2007

ज़िंदगी यूँ हुयी बसर तन्हा

ज़िंदगी यूँ हुयी बसर तन्हा,
काफिला साथ और सफर तन्हा,

अपने साये से चौंक जाते हैं,
उम्र गुजरी है इस कदर तन्हा,

रात भर बोलते हैं सन्नाटे,
रात काटे कोई किधर तन्हा,

दिन गुज़रता नहीं है लोगो में,
रात होती नहीं बसर तन्हा,

हमने दरवाज़े तक तो देखा था,
फ़िर न जाने गए किधर तन्हा,

वो ख़त के पुर्जे उडा रहा था

वो ख़त के पुर्जे उडा रहा था,
हवाओं का रूख दिखा रहा था,

कुछ और भी हो गया नुमाया,
मैं अपना लिखा मिटा रहा था,

उसी का इमा बदल गया है,
कभी जो मेरा खुदा रहा था,

वो एक दिन एक अजनबी को,
मेरी कहानी सुना रहा था,

वो उम्र कम कर रहा था मेरी,
मैं साल अपने बढ़ा रहा था,

शाम से आँख में नमी सी है

शाम से आँख में नमी सी है,
आज फ़िर आपकी कमी सी है,

दफ़न कर दो हमें की साँस मिले,
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है,

वक्त रहता नहीं कहीं छुपकर,
इसकी आदत भी आदमी सी है,

कोई रिश्ता नहीं रहा फ़िर भी,
एक तस्लीम लाज़मी सी है,

Blog at WordPress.com.