एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी,
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी,
यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं,
कितनी सौंधी लगती है तब माझी की रुसवाई भी,
दो दो शक़्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में,
मेरे साथ चला आया है आप का इक सौदाई भी,
ख़ामोशी का हासिल भी इक लंबी सी ख़ामोशी है,
उन की बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी,




इन गज़लों को साथ साथ में सुनवाई जाये तो मजा आयेगा, सिर्फ पढ़ने में क्या आनन्द? एक फरमाईश भी है, राजेश खन्ना और दीपिका चिखलिया की एक फिल्म थी जिसमें गुलशन ग्रोवर भी थे। इस फिल्म में जगजीत सिंहजी ने एक गज़ल गाई थी. बोल याद नहीं आ रहे; अगर सुनवा सकें तो मेहरबानी होगी।
॥दस्तक॥
गीतों की महफिल
Comment by सागर चन्द नाहर — November 2, 2007 @ 6:32 pm |