मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुकसत कर दो,
साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से,
अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज,
फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर,
तुम्ही तन्हा मेरा गम खाने मे आ सकती हो,
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है,
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद,
November 7, 2007
मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुकसत कर दो
क्या भला है क्या बुरा है कुछ नही
अपना अपना रास्ता है कुछ नही,
क्या भला है क्या बुरा है कुछ नही,
जुस्तजू है एक मुसलसल जुस्तजू,
क्या कही कुछ खो गया है कुछ नही,
मोहर मेरे नाम की हर शय पे है,
मेरे घर मे मेरा क्या है कुछ नही,
कहने वाले अपनी अपनी कह गए,
मुझसे पुछ क्या सुना है कुछ नही,
कोई दरवाजे पे है तो क्या हुआ,
आप से कुछ मांगता है कुछ नही,
एक गुलशन था जलवानुमां इस जगह
एक गुलशन था जलवानुमां इस जगह,
रंग-ओ-बू जिसकी दुनिया में मशहूर थी,
बेग़मों की हँसी गूँजती थी यहीं,
शाह की शानोशौकत में भरपूर थी,
ताज की शक्ल में जब तक ये क़िला,
गोल्कोंड़ा की अज़्मत करेगा बयां,
मिट सकेगी नहीं शानेमुल्केदक्कन,
मिट सकेगा नहीं उसका कोई निशां,
ये क़िला ये फ़सीना ये वीरानियां,
हैं उसी शान-ओ-शौकत की परछाइयां,
जिस की दिलकश कहानी का है राज़दां,
ये नीला सितारों जड़ा आसमां,
वक़्त की मार सहकर जो कायम रहे,
कैफ़ियत बस यही थी उसी रान की,
गोल्कोंड़ा की अज़्मत का कहना ही क्या,
ये क़िला है निशानी उसी शान की,



