अपना अपना रास्ता है कुछ नही,
क्या भला है क्या बुरा है कुछ नही,
जुस्तजू है एक मुसलसल जुस्तजू,
क्या कही कुछ खो गया है कुछ नही,
मोहर मेरे नाम की हर शय पे है,
मेरे घर मे मेरा क्या है कुछ नही,
कहने वाले अपनी अपनी कह गए,
मुझसे पुछ क्या सुना है कुछ नही,
कोई दरवाजे पे है तो क्या हुआ,
आप से कुछ मांगता है कुछ नही,
November 7, 2007
क्या भला है क्या बुरा है कुछ नही
4 Comments »
RSS feed for comments on this post. TrackBack URI




मोहर मेरे नाम की हर शय पे है,
मेरे घर मे मेरा क्या है कुछ नही,
Waahhhhhhhhhhhh!!!!!
रेत पर घर बने है लोगों के
सहरा में किसका क्या है कुछ भी नहीं
देवी
Comment by Devi Nangrani — November 8, 2007 @ 8:33 am |
यह ग़ज़ल बहुत सुंदर है. काश आप कवि का नाम भी लिख दिया करें
Comment by Dr S A R Hashmi — November 13, 2007 @ 1:08 pm |
name of poet DR. AKHTAR NAZMI famous urdu poet of india.
Comment by feeroz akhtar — March 26, 2008 @ 11:49 pm |
for discussion on this ghazal or other ghazals from late. Dr. Akhtar Nazmi.. u can contact me on my mail… I’ll be obliged..
Comment by Faaiz Nazmi — April 15, 2009 @ 3:34 pm |