कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

November 15, 2007

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,
क्या गम है जिसको छुपा रहे हो,

आंखो में नमी हँसी लबो पर,
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो,

बन जायेंगे ज़हर पीते पीते,
ये अश्क जो पीते रहे हो,

जिन ज़ख्मों को वक्त भर चला है,
तुम क्यूं उन्हें छेड़े जा रहे हो,

रेखाओं का खेल है मुक्क़द्दर,
रेखाओं से मात खा रहे हो,

1 Comment »

  1. अच्छा गीत प्रेषित किया है।

    Comment by परमजीत बाली — November 16, 2007 @ 12:16 am

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