हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुकदर मेरा,
मैं ही कश्ती हूँ मुझी मे है समंदर मेरा,
एक से हो गए मौसम्हो के चेहरे सारे,
मेरी आखो से कही खो गया मंजर मेरा,
किस से पुछु के कहा गुम हूँ कई बरसों से,
हर जगह दुन्द फिरता है मुझे घर मेरा,
मुद्दते हो गई एक खवाब सुन्हेरा देखे,
जागता रहता है हर नींद मे बिस्तर मेरा,




please correct.
खवाब : ख़्वाब
सुन्हेरा : सुनहरा
Comment by Sankalp — December 4, 2008 @ 2:18 pm |
मुकदर : मुकद्दर
आखो : आँखो
कही : कहीं
मंजर : मंज़र
कहा : कहाँ
दुन्द : ढूँढता
मौसम्हो : मौसमो
पुछु : पुछू
Comment by Sankalp — December 4, 2008 @ 2:24 pm |