नज़र वो है के जो कौन-ओ-मकां के पार हो जाये,
मगर जब रू-ए-ताबां पर पड़े बेकार हो जाये,
नज़र उस हुस्न पर ठहरे तो आख़िर किस तरह ठहरे,
कभी जो फूल बन जाये कभी रुख़सार हो जाये,
चला जाता हूं हंसता खेलता मौज-ए-हवादिस से,
अगर आसानियां हों ज़िंदगी दुशवार हो जाये,
Lyrics: Asghar Gondavi
Singer: Jagjit Singh




अमरजीत सिंह जी,
पहले तो आपको बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने जगजीत सिंह साहब की गजलों को इतनी मेहनत करके नेट पर उतारा है.
मैं भी उनका फेन हूँ . इस ग़ज़ल के बारे में आप कुछ बतैंगे क्यों की कहकशां में ये ग़ज़ल मैंने कभी नही सुनी. ये vol. १ मे है या vol. २ में ?
या फिर ये ग़ज़ल cd और cassettes में नहीं आई है?
Comment by Nitesh S — December 31, 2007 @ 10:46 pm |