कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

दिसम्बर 12, 2007

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं


शहर की रात और मै नाशाद-ओ-नाकारा फिरूं
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूं
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूं

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

झिलमिलाते क़मक़मों की राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर चलती हुई शमशीर सी

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

ये रुपहली छांव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे कौन जाने जी का हाल

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

फिर वो टूटा एक सितारा फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किस की गोद में आये ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी चोट सी दिल पर पड़ी

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

रात हंस हंस कर ये कहती है के मैख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख़ के काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

हर तरफ़ बिखरी हुईं रंगीनियां रानाइयां
हर क़दम पर इशरतें लेतीं हुईं अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुए रुसवाइयां

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

रास्ते में रुक के दम ले लूं मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊं मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये ये क़िस्मत नहीं

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

मुन्तज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा अहद-ए-वफ़ा मेरे लिये

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

जी में आता है कि अब अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूं
उन को पा सकता हूं मै ये आसरा भी छोड़ दूं
हां मुनासिब है ये ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ डूं

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफ़लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

दिल में एक शोला भड़क उठा है आखिर क्या करूं
मेरा पैमाना छलक उठा है आखिर क्या करूं
ज़ख़्म सीने का महक उठा है आखिर क्या करूं

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकड़ों चंगेज़-ओ-नादिर हैं नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्तान जाबर हैं नज़र के सामने

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

ले के इक चंगेज़ के हाथों से ख़ंजर तोड़ दूं
ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूं
कोई तोड़े या न तोड़े मै ही बढ़कर तोड़ दूं

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

बढ़ के इस् इन्दरसभा का साज़-ओ-सामां फूंक दूं
इस का गुलशन फूंक दूं उस का शबिस्तां फूंक दूं
तख़्त-ए-सुल्तां क्या मै सारा क़स्र-ए-सुल्तां फूंक दूं

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

जी में आता है ये मुर्दा चाँद तारे नोच लूं
इस किनारे नोच लूं और उस किनारे नोच लूं
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूं

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

मुझको किस्मत ने बनाय गदले पानी का कंवल
ख़ाक में मिल मिल गये सब आरज़ूओं के महल
क्या खबर थी यूं मेरी तकदीर जायेगी बदल

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

रूठनेवाले के तू मजबूर से रूठेगा क्या
जिस तरह किस्मत ने लूटा यूं कोई लूटेगा क्या
ऐ मेरे टूटे हुए दिल और तू टूटेगा क्या

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

Unsung lines in Bold Italic

Lyrics: Majaz
Singer: Jagjit Singh

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2s टिप्पणियाँ »

  1. नाशाद-ओ-नाकारा = दुख की बात और किसी खास काम के बिना
    वहशत-ए-दिल = दिल का पागलपन
    शहनाज़-ए-लालारुख़ = शानदार और गुलाबी चेहरा

    Comment by deepak — सितम्बर 2, 2010 @ 11:39 अपराह्न | Reply

  2. 1.नाशाद-ओ-नाकारा = उदासीन और किसी खास काम के बिना

    Comment by deepak — सितम्बर 2, 2010 @ 11:41 अपराह्न | Reply


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