कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

नवम्बर 17, 2007

ये क्या जाने में जाना है


ये क्या जाने में जाना है, जाते हो खफा हो कर,
मैं जब जानूं, मेरे दिल से चले जाओ जुदा हो कर,

क़यामत तक उडेगी दिल से उठकर खाक आंखों तक,
इसी रस्ते गया है हसरतों का काफिला हो कर,

तुम्ही अब दर्द-ऐ-दिल के नाम से घबराए जाते हो,
तुम्ही तो दिल में शायद आए थे दर्द-ऐ-आशियाँ हो कर,

यूंही हमदम घड़ी  भर को मिला करते थे बेहतर था,
के दोनों वक्त जैसे रोज़ मिलते हैं जुदा हो कर,

मय पिलाकर आपका क्या जायेगा


मय पिलाकर आपका क्या जायेगा,
जायेगा ईमान जिसका जायेगा,

देख कर मुझको वो शरमा जायेगा,
ये तमाशा किस से देखा जायेगा,

जाऊं बुतखाने से क्यूं काबे को मैं,
हाथ से ये भी ठिकाना जायेगा,

क़त्ल की जब उसने दी धमकी मुझे,
कह दिया मैंने भी देखा जायेगा,

पी भी ले दो घूँट जाहिद पी भी ले,
मैक़दे से कौन प्यासा जायेगा,

नवम्बर 16, 2007

है इख्तियार में तेरे


है इख्तियार में तेरे तो मोज़दा कर दे,
वो शख्स मेरा नही है उसे मेरा कर दे,

यह रेक्ज़ार कहीं खत्म ही नही होता,
ज़रा सी दूर तो रास्ता हरा भरा कर दे,

मैं उसके शोर को देखूं वो मेरा सब्र-ओ-सुकून,
मुझे चिराग बना दे उसे हवा कर दे,

अकेली शाम बहुत ही उदास करती है,
किसी को भेज, कोई मेरा हमनवा कर दे,

ये भी क्या एहसान कम है


ये भी क्या एहसान कम है देखिये न आप का,
हो रहा है हर तरफ़ चर्चा हमारा आप का,

चाँद में तो दाग है पर आप में वो भी नही,
चौध्वी के चाँद से बढ़के है चेहरा आप का,

इश्क में ऐसे भी हम डूबे हुए हैं आप के,
अपने चेहरे पे सदा होता है धोखा आप का,

चाँद-सूरज, धुप-सुबह, कहकशा तारे शमा,
हर उजाले ने चुराया है उजाला आप का,

नवम्बर 15, 2007

जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं


जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं,
हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं,

उन पे तूफान को भी अफ़सोस हुआ करता है,
वो सफिने जो किनारों पे उलट जाते हैं,

हम तो आए थे रहें साख में फूलों की तरह,
तुम अगर हार समझते हो तो हट जाते हैं,

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