कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

November 17, 2007

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुकदर मेरा

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुकदर मेरा,
मैं ही कश्ती हूँ मुझी मे है समंदर मेरा,

एक से हो गए मौसम्हो के चेहरे सारे,
मेरी आखो से कही खो गया मंजर मेरा,

किस से पुछु के कहा गुम हूँ कई बरसों से,
हर जगह दुन्द फिरता है मुझे घर मेरा,

मुद्दते हो गई एक खवाब सुन्हेरा देखे,
जागता रहता है हर नींद मे बिस्तर मेरा,

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