जहाँ जहाँ मुझे सेहरा दिखायी देता है,
मेरी तरह से अकेला दिखायी देता है,
यह एक अब्र का टुकडा कहाँ कहाँ बरसे,
तमाम दस्त ही प्यासा दिखायी देता है,
यह किस मकाम पे लाई है जुस्तजू तेरी,
जहाँ से अर्श भी नीचा दिखायी देता है,
अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे।
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे।
ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना
पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे।
आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आँसू मेरे दामन पर बिखर जाने दे।
ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे।
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माज़ी = Past