कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

October 30, 2006

है लौ ज़िंदगी

है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी

कभी सामने आता मिलने उसे
बड़ा नाम् उसका है मशहूर है

है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी

भवर पास है चल पहन ले इसे
किनारे का फदा बहुत दूर है

है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी

सुना है वो ही करने वाला है सब
सुना है के इंसान मज़बूर है

है लौ ज़िंदगी ज़िंदगी नूर है
मगर इस पे जलने का दस्तूर
है लौ ज़िंदगी

October 27, 2006

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे अहसान उतारता है कोई।

आईना दिख के तसल्ली हुई
हमको इस घर में जानता है कोई।

फक गया है सज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई।

फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुमको शायद मुग़ालता है कोई।

देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हमको पुकारता है कोई।


मुग़ालता = Illusions
सज़र = Branch

सहमा सहमा

सहमा सहमा डरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है

इश्क में और कुछ नहीं होता
आदमी बावरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है

एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
एक पल देख लूँ
एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
जल गया सब जरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है

चाँद जब आसमाँ पे आ जाए
आप का आसरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है

October 25, 2006

फुलों की तरह लब खोल कभी

फुलों की तरह लब खोल कभी
ख़ूश्बू की ज़ुबा मे बोल कभी
अलफ़ाज़ परखता रेहता है
आवाज़ हमारी तोल कभी
अन्मोल नहीं लेकिन फिर भी
पूछो तो मुफ़्त का मोल कभी
खिड़की में कटी है सब राते
कुछ चौर्स थीं, कुछ गोल कभी
ये दिल भी दोस्त ज़मीं की तरह
हो जाता है डांवां डोल कभी

October 24, 2006

ज़िंदगी क्या है जानने के लिये

ज़िंदगी क्या है जानने के लिये
ज़िंदा रहना बहुत जरुरी है
आज तक कोई भी रहा तो नही

सारी वादी उदास बैठी है
मौसमे गुल ने खुदकशी कर ली
किसने बरुद बोया बागो मे

आओ हम सब पहन ले आइने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सारे हसीन लगेंगे यहाँ

है नही जो दिखाई देता है
आइने पर छपा हुआ चेहरा
तर्जुमा आइने का ठीक नही

हम को गलिब ने येह दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
ये बरस तो फकत दिनो मे गया

लब तेरे मीर ने भी देखे है
पखुड़ी एक गुलाब की सी है
बात सुनते तो गलिब रो जाते

ऐसे बिखरे है रात दिन जैसे
मोतियो वाला हार टूट गया
तुमने मुझको पिरो के रखा था

October 23, 2006

आप अगर इन दिनो यहाँ होते

आप अगर इन दिनो यहाँ होते
हम ज़मीन पर भला कहाँ होते
आप अगर इन दिनो यहाँ होते

वक़्त गुज़्रा नही अभी वरना
रेत पर पाँव के निशाँ होते

मेरे आगे नही था अगर कोई मेरे
पीछे तो कारवा होते

तेरे साहिल पे लौट कर आती
अगर उम्मीदो के बादबा होते

आप अगर इन दिनो यहाँ होते
हम ज़मीन पर भला कहाँ होते
आप अगर इन दिनो यहाँ होते

October 20, 2006

नज़र उठाओ ज़रा तुम तो क़ायनात चल

नज़र उठाओ ज़रा तुम तो क़ायनात चले,
है इन्तज़ार कि आँखों से “कोई बात चले” ||

तुम्हारी मर्ज़ी बिना वक़्त भी अपाहज है
न दिन खिसकता है आगे, न आगे रात चले ||

न जाने उँगली छुडा के निकल गया है किधर
बहुत कहा था जमाने से साथ साथ चले ||

किसी भिखारी का टूटा हुआ कटोरा है
गले में डाले उसे आसमाँ पे रात चले ||

Blog at WordPress.com.