हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुकदर मेरा
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुकदर मेरा,
मैं ही कश्ती हूँ मुझी मे है समंदर मेरा,
एक से हो गए मौसम्हो के चेहरे सारे,
मेरी आखो से कही खो गया मंजर मेरा,
किस से पुछु के कहा गुम हूँ कई बरसों से,
हर जगह दुन्द फिरता है मुझे घर मेरा,
मुद्दते हो गई एक खवाब सुन्हेरा देखे,
जागता रहता है हर नींद मे बिस्तर मेरा,


