कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

October 25, 2007

हर एक घर में दीया भी जले अनाज भी हो

हर एक घर में दीया भी जले अनाज भी हो,
अगर न हो कही ऐसा तो एहतराज़ भी हो,

हुकुमतो को बदलना तो कुछ मुहाल नही,
हकुमाते जो बदलता है वह समाज भी हो,

रहेगी कब तलक वादों में क़ैद खुशहाली,
हर एक बार ही कल क्यों कभी आज भी हो,

न करते शोर शराबा तो और क्या करते,
तुम्हारे शहर में कुछ और कम काज भी हो,

May 19, 2007

तेरी आँखों से ही जागे सोये हम

तेरी आँखों से ही जागे सोये हम
कब तक आखिर तेरे ग़म को रोये हम
वक्त का मरहम ज़ख़्मों को भर देता है ,
शीशे को भी ये पत्थर कर देता है ।
रात में तुझको पाऐं , दिन में खोये हम ।
हर आहट पर लगता है तू आया हैं ,
धूप है मेरे पीछे आगे साया है ,
खुद अपनी ही लाश को कब तक ढोये हम ।
तेरी आँखों से ही जागे सोये हम…….

December 20, 2006

बेनाम सा ये दर्द

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नही जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नही जाता,

सब कुछ तो है क्या ढूंढती हैं ये निगाहें,
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यों नहीं जाता,

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहां मे,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नही जाता,

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यों नहीं जाता,

वो नाम जो बरसो से ना चेहरा ना बदन है,
वो ख्वाब अगर है तो बिखर क्यों नहीं जाता

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