हर एक घर में दीया भी जले अनाज भी हो,
अगर न हो कही ऐसा तो एहतराज़ भी हो,
हुकुमतो को बदलना तो कुछ मुहाल नही,
हकुमाते जो बदलता है वह समाज भी हो,
रहेगी कब तलक वादों में क़ैद खुशहाली,
हर एक बार ही कल क्यों कभी आज भी हो,
न करते शोर शराबा तो और क्या करते,
तुम्हारे शहर में कुछ और कम काज भी हो,
तेरी आँखों से ही जागे सोये हम
कब तक आखिर तेरे ग़म को रोये हम
वक्त का मरहम ज़ख़्मों को भर देता है ,
शीशे को भी ये पत्थर कर देता है ।
रात में तुझको पाऐं , दिन में खोये हम ।
हर आहट पर लगता है तू आया हैं ,
धूप है मेरे पीछे आगे साया है ,
खुद अपनी ही लाश को कब तक ढोये हम ।
तेरी आँखों से ही जागे सोये हम…….
बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नही जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नही जाता,
सब कुछ तो है क्या ढूंढती हैं ये निगाहें,
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यों नहीं जाता,
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहां मे,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नही जाता,
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यों नहीं जाता,
वो नाम जो बरसो से ना चेहरा ना बदन है,
वो ख्वाब अगर है तो बिखर क्यों नहीं जाता