मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुकसत कर दो,
साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से,
अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज,
फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर,
तुम्ही तन्हा मेरा गम खाने मे आ सकती हो,
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है,
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद,
नवम्बर 7, 2007
मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुकसत कर दो
जनवरी 10, 2007
हम भी शराबी तुम भी शराबी
हम भी शराबी तुम भी शराबी!
छलके गुलाबी छलके गुलाबी!
तक़दीर दिल की खाना खराबी !!
जब तक है जीना खुष होके जीले
जब तक है पीना जी भर के पीले
हसरत ना कोई रह जाये बाकी !!
हम भी शराबी तुम भी शराबी….
कल सुबह के दामन में तुम होंगे ना हम होंगे,
बस रेत के सीने पर कुछ नख़्शे कदम होंगे !
बस रात भर के मेहमान हम है,
जुल्फ़ों के शब के थोडे से कम है!
बाक़ी रहेगा सागर ना साक़ी !!
हम भी शराबी तुम भी शराबी!
छलके गुलाबी छलके गुलाबी!
तक़दीर दिल की खाना खराबी !!
तमन्नाओ के बहलावे में अक्सर आ ही जाते है
तमन्नाओ के बहलावे में अक्सर आ ही जाते है,
कभी हम चोट खाते है, कभी हम मुस्कुराते है!
हम अक्सर दोस्तों की बेवफ़ाई सह तो लेते है,
मगर हम जानते है, दिल हमारे टुट जाते है!
किसी के साथ जब बीते हुए लम्होंकी याद आयी,
थकी आखोंमे अश्को के सितारे झिलमिलाते है!
ये कैसा इश्तियाक-ए-बीद है और कैसी मजबुरी,
किसी बज्म तक जा जाके हम क्युँ लौट आते है !


