कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

October 6, 2007

मंज़िल न दे चराग न दे हौसला तो दे

मंज़िल न दे चराग न दे हौसला तो दे,
तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे,

मैंने ये कब कहा के मेरे हक में हो जवाब,
लेकिन खामोश क्यूँ है तू कोई फैसला तो दे,

बरसों मैं तेरे नाम पे खाता रहा फरेब,
मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे,

बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार,
लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे,

October 5, 2007

ये तो नही के गम नही

ये तो नही के गम नही,
हाँ मेरी आँख नम नही,

तुम भी तो तुम नहीं हो आज,
हम भी तो आज हम नही,

अब न खुशी की है खुशी,
गम का भी अब तो गम नही,

मौत अगर चेमौत है,
मौत से ज़ीस्त कम नही,

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे,
यह छलकती हुयी आखो को भी पत्थर कर दे,

तुझ को देखा नही, महसूस किया है मैंने,
आ किसी  दिन मेरे अहसास को पय्कर कर दे,

और कुछ डर मुझे, डरकर नही है लकिन,
मेरी चादर मेरे पैरो के, बराबर कर दे,

December 19, 2006

सोचा नहीं अच्छा-बुरा

सोचा नहीं अच्छा-बुरा, देखा-सुना कुछ भी नहीं..
मांगा खुदा से रात-दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं..

देखा तुझे, सोचा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे..
मेरी खता मेरी वफ़ा, तेरी खता कुछ भी नहीं..

जिस पर हमारी आंख ने मोती बिछाये रात-भर..
भेजा उन्हे कागज़ वोही, लिखा मगर कुछ भी नहीं..

एक शाम की दहलीज पर, बैठे रहे वो देर तक..
आंखों से की बातें बहुत, मुह से कहा कुछ भी नहीं..

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