कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

नवम्बर 17, 2007

मुझ में जो कुछ अच्छा है सब उसका है


मुझ में जो कुछ अच्छा है सब उसका है,
मेरा जितना चर्चा है सब उसका है,

उसका मेरा रिश्ता बड़ा पुराना है,
मैंने जो कुछ सोचा है सब उसका है,

मेरे आँखें उसकी नूर से रोशन है,
मैंने जो कुछ देखा है सब उसका है,

मैंने जो कुछ खोया था सब उसका था,
मैंने जो कुछ पाया है सब उसका है,

जितनी बार मैं टूटा हूँ वो टूटा था,
इधर उधर जो बिखरा है सब उसका है,

कभी आंसू कभी खुशी बेची


कभी आंसू कभी खुशी बेची,
हम गरीबो ने बेकसी बेची,

चाँद साँसे खरीदने के लिए,
रोज़ थोडी सी ज़िंदगी बेची,

जब रुलाने लगे मुझे साये,
मैंने उकता के रौशनी बेची,

एक हम थे के बिक गए ख़ुद ही,
वरना दुनिया ने दोस्ती बेची,

आज के दौर में


आज के दौर में, ऐ दोस्त, ये मंजर क्यूं है,
ज़ख्म हर सर पे, हर इक हाथ में, पत्थर क्यूं है,

जब हकीकत है, के हर ज़र्रे में तू रहता है,
फ़िर ज़मीं पर, कहीं मस्जिद, कहीं मन्दिर क्यूं है,

अपना अंजाम तो मालूम है सबको फिर भी,
अपनी नज़रों में, हर इंसान, सिकंदर क्यूं है,

ज़िंदगी जीने के, काबिल ही नही, अब “फाकिर”,
वरना हर आँख में, अश्कों का, समंदर क्यूं है,

माँ सुनाओ मुझे वो कहानी


माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,
जिसमे राजा न हो न हो रानी,

जो हमारी तुम्हारी कथा हो,
जो सभी के ह्रदय की गाथा हो,
गंध जिसमे हो अपनी धारा की,
बात जिसमे न हो अप्सरा की,
हो न परियां जहाँ आसमानी,

वो कहानी को हँसना सिखा दे,
पेट की भूख को भी मिटा दे,
जिसमे सच की भरी चांदनी हो,
जिसमे उम्मीद की रौशनी  हो,
जिसमे न हो कहानी पुरानी,

वो रुलाकर हंस न पाया देर तक


वो रुलाकर हंस न पाया देर तक,
जब मैं रो कर मुस्कुराया देर तक,

भूलना चाहा अगर उसको कभी,
और भी वो याद आया देर तक,

भूखे बच्चों की तसल्ली के लिए,
माँ ने फिर पानी पकाया देर तक,

गुनगुनाता जा रहा था इक फकीर,
धुप रहती है न साया देर तक,

अपने चेहरे से जो जाहिर है


अपने चेहरे से जो जाहिर है, छुपाये कैसे,
तेरी मरजी के मुताबिक नज़र आए कैसे,

घर सजाने का तसबुर तो बहुत बाद का है,
पहले यह तय हो के इस घर को बचाए कैसे,

कहकहा आंख का बर्ताव बदल देता है,
हँसने वाले तुझे आंसू नज़र आये कैसे,

कोई अपनी ही नज़र से जो हमे देखेगा,
एक कतरे को समंदर नज़र आये कैसे,

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