कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 16, 2007

जवान है रात सकिया शराब ला शराब ला


जवान है रात सकिया शराब ला शराब ला,
ज़रा सी प्यास तो बुझा शराब ला शराब ला,

तेरे शबाब पर सदा करम रहे बहार का,
तुझे लगे मेरी दुआ शराब ला शराब ला,

यहाँ कोई न जी सका न जी सकेगा होश में,
मिटा दे नाम होश का शराब ला शराब ला,

तेरा बड़ा ही शुक्रिया पिलाए जा पिलाए जा,
न ज़िक्र कर हिसाब का शराब ला शराब ला,

तुमने सूली पे लटकते जिसे देखा होगा


तुमने सूली पे लटकते जिसे देखा होगा,
वक्त आएगा वही शक्श मसीहा होगा,

ख्वाब देखा था के सेहरा में बसेरा होगा,
क्या ख़बर थी के यही ख्वाब तो सच्चा होगा,

मैं फ़िज़ाओं में बिखर जाऊंगा खुशबू बनकर,
रंग होगा न बदन होगा न चेहरा होगा,

अक्टूबर 17, 2006

पसीने पसीने हुई जा रहे हो


पसीने पसीने हुई जा रहे हो
ये बोलो कहां से चले आ रहे हो
हमें सब्र करने को कह तो रहे हो
मगर देख लो ख़ुद ही घबरा रहे हो

ये किसकी बुरी तुम को नज़र लग गई है
बहारों के मौसम में मुर्झा रहे हो

ये आईना है ये तो सच ही कहेगा
क्यों अपनी हक़ीक़त से कतरा रहे हो

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