कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 4, 2007

जिन्दगी तुझको जिया है कोई अफ़सोस नहीं


जिन्दगी तुझको जिया है कोई अफ़सोस नहीं,
ज़हर ख़ुद मैंने पिया है कोई अफ़सोस नहीं,

मैंने मुजरिम को भी मुजरिम न कहा दुनिया में,
बस यही जुर्म किया है कोई अफ़सोस नहीं,

मेरी किस्मत में जो लिखे थे उन्ही काँटों से,
दिल के ज़ख्मों को सीया है कोई अफ़सोस नहीं,

अब गिरे संग के शीशों की हूँ बारिश ‘फाकिर’,
अब कफ़न ओढ़ लिया है कोई अफ़सोस नहीं,

शायद मैं जिन्दगी की सहर ले के आ गया


शायद मैं जिन्दगी की सहर ले के आ गया,
कातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया,

ता उम्र धुंद्ता रहा मंज़िल मैं इश्क की,
अंजाम ये के गरदे सफर ले के आ गया,

नश्तर है मेरे हाथ में कंधों पे मयकदा,
लो मैं इलाजे दर्द-ऐ-जिगर ले के आ गया,

‘फाकिर’ सनम मयकदे में न आता मैं लौटकर,
इक ज़ख्म भर गया था इधर ले के आ गया,

ला पिला दे शराब ऐ साकी


ढल गया आफताब ऐ साकी,
ला पिला दे शराब ऐ साकी,

या सुराही लगा मेरे मुँह से,
या उलट दे नकाब ऐ साकी,

मैकदा छोड़ कर कहाँ जाऊं,
है ज़माना ख़राब ऐ साकी,

जाम भर दे गुनाहगारों के,
ये भी है इक सवाब ऐ साकी,

आज पीने दे और पीने दे,
कल करेंगे हिसाब ऐ साकी,

सितम्बर 18, 2007

जिस मोड़ पर किए थे


जिस मोड़ पर किए थे हम इन्तेजार बरसों,
उससे लिपट के रोये दीवाना-वार बरसों,

तुम गुलसितां से आए ज़िक्र खिज़ां हिलाए,
हमने कफ़स में देखी फासले बहार बरसों,

होती रही है यूं तो बरसात आसुओं की,
उठते रहे हैं फिर भी दिल से गुबार बरसों,

वो संग-ऐ-दिल था कोई बेगाना-ऐ-वफ़ा था,
करते रहें है जिसका हम इंतजार बरसों,

अक्टूबर 27, 2006

बड़ी हसीन रात थी


चराग़-ओ-आफ़ताब ग़ुम बड़ी हसीन रात थी
शबाब की नक़ाब गुम बड़ी हसीन रात थी।

मुझे पिला रहे थे वो कि ख़ुद ही शमाँ बुझ गई
गिलास ग़ुम,शराब ग़ुम बड़ी हसीन रात थी।

लिखा था जिस किताब कि इश्क़ तो हराम है
हुई वही किताब ग़ुम बड़ी हसीन रात थी।

लबों से लब जो मिल गए,लबों से लब ही सिल गए
सवाल ग़ुम जवाब ग़ुम बड़ी हसींन रीत थी।

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