कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

सितम्बर 18, 2007

मुझे गुसा दिखाया जा रहा है


मुझे गुसा दिखाया जा रहा है,
तबस्सुम को दबाया जा रहा है,

वहाँ तक आबरू जब्त-ऐ-गम है,
जहाँ तक मुस्कुराया जा रहा है,

दो आलम मैंने छोडे जिसके खातिर,
वही दामन छुडाया जा रहा है,

क़रीब आने में है उनको तकल्लुफ,
वहीँ से मुस्कुराया जा रहा है,

मेरे क़रीब न आओ


मेरे क़रीब न आओ के मैं शराबी हूँ,
मेरा शवों जगाओ के मैं शराबी हूँ,

ज़माने भर के निगाहों से गिर चुका हूँ मैं,
नज़र से तुम न गिराओ के मैं शराबी हूँ,

ये अर्ज़ करता हूँ गिर कर खुलुश वालों से,
उठा सको तो उठाओ के मैं शराबी हूँ,

तुम्हारी आँख से भर लूँ सुरूर आंखों में,
नज़र नज़र से मिलाओ के मैं शराबी हूँ,

सितम्बर 17, 2007

मान मौसम का कहा


मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा,
आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा,

ऐ मेरे यार तुझे उसकी कसम देता हूँ,
भूल जा शिकवे गिले हाथ मिला जाम उठा,

एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा,
देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा,

प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ,
मयकदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा,

कौन आएगा यहाँ


कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा,
मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा,

दिल-ऐ-नादान न धड़क ऐ दिल-ऐ-नादान न धड़क,
कोई खत लेके पड़ोसी के घर आया होगा,

गुल से लिपटी हुयी तितली को गिराकर देखो,
आंधीयों तुमने दरख्तों को गिराया होगा,

‘कैफ़’ परदेस में मत याद करो अपना मकान,
अबके बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा,

बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है


बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है,
जो रोज भेष बदल कर मेरी तलाश में है,

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है,
दुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है,

मैं देवता की तरह कैद अपने मन्दिर में,
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है,

मैं जिसके हाथ में एक फूल देके आया था,
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है,

अक्टूबर 17, 2006

आप से गिला आप की क़सम


आप से गिला आप की क़सम
सोचते रहें कर न सके हम
उस की क्या ख़ता लदवा है गम़
क्यूं गिला करें चारागर से हम

ये नवाज़िशें और ये करम
फ़र्त-व-शौक़ से मर न जाएं हम

खेंचते रहे उम्र भर मुझे
एक तरफ़ ख़ुदा एक तरफ़ सनम

ये अगर नहीं यार की गली
चलते चलते क्यूं स्र्क गए क़दम

अक्टूबर 16, 2006

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता हैं

Filed under: Albums,Jagjit Singh,Unique — Amarjeet Singh @ 8:01 अपराह्न
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तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता हैं
तेरे आगे चांद पुराना लगता हैं

तिरछे तिरछे तीर नजर के चलते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता हैं

आग का क्या हैं पल दो पल में लगती हैं
बुझते बुझते एक ज़माना लगता हैं

सच तो ये हैं फूल का दिल भी छल्ली हैं
हसता चेहरा एक बहाना लगता हैं

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