कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

नवम्बर 21, 2007

रातें थी सूनी सूनी


रातें थी सूनी सूनी, दिन भी उदास थे मेरे,
तुम मिल गए तो जागे सोये हुए सवेरे,
खामोश इन लबो को एक रागिनी मिली है,
मुरझाये से गुलो को एक ताजगी मिली है,
घेरे हुए थे मुझ को कब से घने अंधेरे,
रूठा हुआ था मुझसे, खुशियों को है तराना,
लगता था जिंदगानी, बन जायेगी फ़साना,
हर सु लगे हुए थे तन्हाइयो के फेरे,

सर ही न झुका


सर ही न झुका, दिल भी तो झुका,
कल्याण यंही होगा, निर्वाण यही होगा,

इन दीवारों से बातें कर,
मत छलका तू मन का सागर,

जीवन में यह सन्नाटा भर,
फिर कान लगा, कल्याण यंही होगा,

Singer: Jagjit Singh

नवम्बर 20, 2007

बड़ी नाजुक है


बड़ी नाजुक है ये मंजिल, मोहब्बत का सफर है,
धड़क आहिस्ता से ए दिल, मोहब्बत का सफर है,

कोई सुन ले न ये किस्सा, बहुत डर लगता है,
मगर डरने से क्या हासिल, मोहब्बत का सफर है,

बताना भी नही आसान, छुपाना भी कठिन है,
खुदा अक्सर कदर मुश्किल, मोहब्बत का सफर है,

उजाले दिल के फैले है, चले आओ न जानम,
बहुत ही प्यार के काबिल, मोहब्बत का सफर है,

Singer: Jagjit Singh

नवम्बर 19, 2007

इश्क क्या है


इश्क क्या है, इश्क इबादत,
इश्क है इमान,

इश्क जगाये, पत्थर में भी,
दिल में हो, जैसे अरमा,

इश्क में मरना, इश्क में जीना,
इश्क का दामन, छोड़ कभी न,

इश्क को जिसने, जान लिया है,
उसने रब को, मान लिया है,

इश्क में खुशियो का मौसम है,
इश्क में आंसू, इश्क में गम है,

इश्क में जो भी खोया,
खो देता, अपनी पहचान,

इश्क सफर है, इश्क मुसाफिर,
इश्क छिपा है, इश्क है जाहिर,

इश्क ग़ज़ल है, इश्क तराना,
इश्क का जादू, सदियों पुराना,

इश्क में दिल खिलते है,
यह दिल हो जाते विरान,

नवम्बर 15, 2007

झुकी झुकी सी नज़र बेकरार है के नही


झुकी झुकी सी नज़र बेकरार है के नही,
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है के नही,

तू अपने दिल की जवाँ धडकनों को गिन के बता,
मेरी तरह तेरा दिल बेकरार है के नही,

वो पल के जिस में मोहब्बत जवाँ होती है,
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है के नही,

तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को,
तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है के नही,

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो


तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,
क्या गम है जिसको छुपा रहे हो,

आंखो में नमी हँसी लबो पर,
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो,

बन जायेंगे ज़हर पीते पीते,
ये अश्क जो पीते रहे हो,

जिन ज़ख्मों को वक्त भर चला है,
तुम क्यूं उन्हें छेड़े जा रहे हो,

रेखाओं का खेल है मुक्क़द्दर,
रेखाओं से मात खा रहे हो,

अक्टूबर 30, 2006

ऐ काश वो किसी दिन


ऐ काश वो किसी दिन तन्हाईयो मे आये
उनको ये राज़-ए-दिल हम महफिल मे क्या बताये

लगता है डर उन्हे तो हमराज़ ले के आये
जो पुछना है पुछे कहना है जो सुनाये

तोबा हमारी हमदम उन्हे हाथ भी लगाये
ऐ काश वो किसी दिन तन्हाईयो मे आये

उन्हे इश्क़ अगर न होता पल्के नही झुकाते
गालो पे शोख बादल ज़ुल्फो के न गिराते

करदे न क़त्ल हमको मासूम ये अदाये
ऐ काश वो किसी दिन तन्हाईयो मे आये

ऐ काश वो किसी दिन् टन्हयियो मेइन् आये
उनको ये राज़-ए-दिल हम महफिल मे क्या बताये

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