कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

December 24, 2007

तुझसे मिलने की सज़ा देंगे

तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग,
ये वफाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग,

क्या ख़बर थी तेरे मिलने पे क़यामत होगी,
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग,

तेरी नज़रों से गिराने के लिए जान-ऐ-हया,
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग,

कह के दीवाना मुझे मार रहे हैं पत्थर,
और क्या इसके सिवा देंगे तेरे शहर के लोग,

Singer: Jagjit Singh

October 4, 2007

दिल में अब दर्द-ऐ-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

दिल में अब दर्द-ऐ-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं,
जिन्दगी मेरी इबादत के सिवा कुछ भी नहीं,

मैं तेरी बारगाह-ऐ-नाज़ में क्या पेश करूं,
मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं,

ऐ खुदा मुझ से न ले मेरे गुनाहों का हिसाब,
मेरे पास अश्क-ऐ-नदामत के सिवा कुछ भी नहीं,

वोह तो मिट कर मुझे मिल ही गयी राहत वर्ना,
जिन्दगी रंज-ओ-मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं,

धुआं बनाके फिजां में उड़ा दिया मुझको

धुआं बनाके फिजां में उड़ा दिया मुझको,
मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको,

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए,
सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझको,

सफेद रंग की चादर लपेट कर मुझ पर,
फसीने शहर से किसी ने सजा दिया मुझको,

मैं एक ज़रा बुलंदी को छूने निकला था,
हवा ने थम के ज़मीन पर गिरा दिया मुझको,

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह,
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह,

मैंने तुझ से चाँद सितारे कब मांगे,
रोशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह,

सूरज सी एक चीज़ तो हम सब देख चुके,
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह,

या धरती के ज़ख्मों पर मरहम रखदे,
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह,

October 16, 2006

गम का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी

गम का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी
ये नज़राना तेरा भी है, मेरा भी

अपने गम को गीत बनाकर गा लेना
राग पुराना तेरा भी है, मेरा भी

शहर में गलीयों गलीयों जिसका चर्चा है
वो अफ़साना तेरा भी है, मेरा भी

तू मुझको और मैं तुझको समझाये क्या
दिल दिवाना तेरा भी है, मेरा भी

मैखाने की बात न कर मुझसे वाईज़
आना जाना तेरा भी है, मेरा भी

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी

सुबह से श्याम तक बोझ ढाता हुआ
अपनी ही लाश पर खुद मजार आदमी

हर तरफ़ भागते दौडते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी

रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतजार आदमी

जिंदगी का मुकद्दर सफ़र दर सफ़र
आखरी सांस तक बेकरार आदमी

जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है

जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है,
बंदे के दिल में क्या है अल्लाह जानता है।

ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है,
पर्दों में क्या छिपा है अल्लाह जानता है।

जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता,
वो कौन सी जगह है अल्लाह जानता है

नेक़ी-बदी को अपने कितना ही तू छिपाए,
अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है।

ये धूप-छाँव देखो ये सुबह-शाम देखो
सब क्यों ये हो रहा है अल्लाह जानता है।

क़िस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन
क़िस्मत में क्या लिखा है अल्लाह जानता है।

अर्श = Roof

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