कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 23, 2007

शम्मे मजार थी न कोई सोगवार था


शम्मे मजार थी न कोई सोगवार था,
तुम जिस पे रो रहे थे वो किसका मजार था,

तडपूंगा उम्र भर दिल-ऐ-मरहूम के लिए,
कमबख्त नामुराद लड़कपन का यार था,

जादू है या तिलिस्म तुम्हारी जुबान में,
तुम झूट कह रहे थे मुझे एतबार था,

क्या क्या हमारी सजदे की रुस्वाइयां हुईं,
नक्शे-कदम किसी का सरे रेह्गुज़ार था,

अब के बरस भी वो नही आया बहार में


अब के बरस भी वो नही आया बहार में,
गुज़रेगा और एक बरस इंतज़ार में,

ये आग इश्क की है बुझाने से क्या बुझे,
दिल तेरे बस में है न मेरे इख्तियार में,

है टूटे दिल में तेरी मोहब्बत तेरा ख़याल,
खुश-रंग है बहार जो गुजारी बहार में,

आंसू नही है आंखों में लेकिन तेरे बगैर,
वो कापते हुए हैं दिल-ऐ-बेकरार में,

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काटों से भी जीनत होती है


गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काटों से भी जीनत होती है,
जीने के लिए इस दुनिया मे गम की भी ज़रूरत होती है,

ऐ वाइज़-ऐ-नादान करता है तू एक क़यामत का चर्चा,
यहाँ रोज़ निगाहें मिलती हैं यहाँ रोज़ क़यामत होती है,

वो पुर्सिश-ऐ-गम को आये हैं कुछ कह न सकूं चुप रह न सकूं,
खामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दू तो शिकायत होती है,

करना ही पड़ेगा जब्त-ऐ-आलम पीने ही पड़ेंगे ये आंसू,
फरियाद-ओ-फुगान से ऐ नादाँ तौहीन-ऐ-मोहब्बत होती है,

जो आके रुके दामन पे सदा वो अश्क नहीं है पानी है,
जो अश्क न छलके आंखों से उस अश्क की कीमत होती है,

काँटों की चुभन पायी फूलों का मज़ा भी


काँटों की चुभन पायी फूलों का मज़ा भी,
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हँसा भी,

आने का सबब याद न जाने की ख़बर है,
वो दिल में रहा और उसे तोड़ गया भी,

हर एक से मंजिल का पता पूछ रहा है,
गुमराह मेरे साथ हुआ रहनुमा भी,

‘गुमनाम’ कभी अपनों से जो गम हुए हासिल,
कुछ याद रहे उनमे तो कुछ भूल गया भी,

जब तेरा नाम प्यार से लिखती हैं ऊँगलियाँ


जब तेरा नाम प्यार से लिखती हैं ऊँगलियाँ,
मेरी तरफ़ ज़माने की उठती हैं ऊँगलियाँ,

दामन सनम का हाथ में आया था एक पल,
दिन रात उस एक पल से महकती हैं ऊँगलियाँ,

जब से दूर हो गए हो उस दिन से ही सनम,
बस दिन तुम्हारे आने के गिनती हैं ऊँगलियाँ,

पत्थर तराश कर ना बना ताज एक नया,
फनकार के ज़माने में कट्ठी हैं ऊँगलियाँ,

दिन आ गए शबाब के आँचल संभालिये


दिन आ गए शबाब के आँचल संभालिये,
होने लगी है शहर में हलचल संभालिये,

चलिए संभल संभल के कठिन राह-ऐ-इश्क है,
नाज़ुक बड़ी है आपकी पायल संभालिये,

सज धज के आप निकले सरे राह खैर हो,
टकरा न जाए आपका पागल संभालिये,

घर से ना जाओ दूर किसी अजनबी के साथ,
बरसेंगे जोर-जोर से बादल संभालिये,

ये कैसी मोहब्बत कहाँ के फ़साने


ये कैसी मोहब्बत कहाँ के फ़साने,
ये पीने पिलाने के सब है बहाने,

वो दामन हो उनका के सुनसान सेहरा,
बस हमको तो आख़िर हैं आंसू बहाने,

ये किसने मुझे मस्त नज़रों से देखा,
लगे ख़ुद-ब-ख़ुद ही कदम लड़खडाने,

चलो तुम भी ‘गुमनाम’ अब मैकदे में,
तुम्हे दफन करने हैं कई गम पुराने,

उल्फत का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े


उल्फत का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े,
अपनी वफ़ा का सोच के अंजाम रो पड़े,

हर शाम ये सवाल मोहब्बत से क्या मिला,
हर शाम ये जवाब के हर शाम रो पड़े,

राह-ऐ-वफ़ा में हमको खुशी की तलाश थी,
दो कदम ही चले थे के हर कदम रो पड़े,

रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला,
अपने ही सर लिया कोई इल्जाम रो पड़े,

अक्टूबर 16, 2006

बात साक़ी की न टाली जाएगी


बात साक़ी की न टाली जाएगी
कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी।

देख लेना वो न खाली जाएगी
आह जो दिल से निकाली जाएगी।

ग़र यही तर्ज़-ए-फुगाँ है अन्दलीब
तो भी गुलशन से निकाली जाएगी।

आते-आते आएगा उनको ख़याल
जाते-जाते बेख़याली जाएगी।

क्यों नहीं मिलती गले से तेग़-ए-नाज़
ईद क्या अब के भी खाली जाएगी।

फुगाँ = Cry of Pain
अन्दलीब = Nightingale
तेग़ = Sword

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