कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 16, 2006

आपको देख कर देखता रह गया

Filed under: Albums,Jagjit Singh,Live with Jagjit Singh — Amarjeet Singh @ 8:21 अपराह्न

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया।

उनकी आँखों से कैसे छलकने लगा
मेरे होठों पे जो माजरा रह गया।

ऐसे बिछड़े सभी रात के मोड़ पर
आखिरी हमसफ़र रास्ता रह गया।

सोच कर आओ कू-ए-तमन्ना है ये
जानेमन जो यहाँ रह गया रह गया।


कू = Lane, Street

आज फिर उनका सामना होगा


आज फिर उनका सामना होगा
क्या पता उसके बाद क्या होगा।

आसमान रो रहा है दो दिन से
आपने कुछ कहा-सुना होगा।

दो क़दम पर सही तेरा कूचा
ये भी सदियों का फ़सला होगा।

घर जलाता है रोशनी के लिए
कोई मुझ सा भी दिलजला होगा।

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो


ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी।
मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।

मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा,
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा,
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी।

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना,
वो झूलों से गिरना, वो गिर के सँभलना,
वो पीतल के छल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना,बना के मिटाना,
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी,

वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी,
न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी।

गम का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी


गम का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी
ये नज़राना तेरा भी है, मेरा भी

अपने गम को गीत बनाकर गा लेना
राग पुराना तेरा भी है, मेरा भी

शहर में गलीयों गलीयों जिसका चर्चा है
वो अफ़साना तेरा भी है, मेरा भी

तू मुझको और मैं तुझको समझाये क्या
दिल दिवाना तेरा भी है, मेरा भी

मैखाने की बात न कर मुझसे वाईज़
आना जाना तेरा भी है, मेरा भी

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी


हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी

सुबह से श्याम तक बोझ ढाता हुआ
अपनी ही लाश पर खुद मजार आदमी

हर तरफ़ भागते दौडते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी

रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतजार आदमी

जिंदगी का मुकद्दर सफ़र दर सफ़र
आखरी सांस तक बेकरार आदमी

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता हैं

Filed under: Albums,Jagjit Singh,Unique — Amarjeet Singh @ 8:01 अपराह्न
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तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता हैं
तेरे आगे चांद पुराना लगता हैं

तिरछे तिरछे तीर नजर के चलते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता हैं

आग का क्या हैं पल दो पल में लगती हैं
बुझते बुझते एक ज़माना लगता हैं

सच तो ये हैं फूल का दिल भी छल्ली हैं
हसता चेहरा एक बहाना लगता हैं

बात साक़ी की न टाली जाएगी


बात साक़ी की न टाली जाएगी
कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी।

देख लेना वो न खाली जाएगी
आह जो दिल से निकाली जाएगी।

ग़र यही तर्ज़-ए-फुगाँ है अन्दलीब
तो भी गुलशन से निकाली जाएगी।

आते-आते आएगा उनको ख़याल
जाते-जाते बेख़याली जाएगी।

क्यों नहीं मिलती गले से तेग़-ए-नाज़
ईद क्या अब के भी खाली जाएगी।

फुगाँ = Cry of Pain
अन्दलीब = Nightingale
तेग़ = Sword

जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है


जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है,
बंदे के दिल में क्या है अल्लाह जानता है।

ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है,
पर्दों में क्या छिपा है अल्लाह जानता है।

जाकर जहाँ से कोई वापस नहीं है आता,
वो कौन सी जगह है अल्लाह जानता है

नेक़ी-बदी को अपने कितना ही तू छिपाए,
अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है।

ये धूप-छाँव देखो ये सुबह-शाम देखो
सब क्यों ये हो रहा है अल्लाह जानता है।

क़िस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन
क़िस्मत में क्या लिखा है अल्लाह जानता है।

अर्श = Roof

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे


अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे।
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे।

ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना
पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे।

आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आँसू मेरे दामन पर बिखर जाने दे।

ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे।


माज़ी = Past

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

Filed under: Albums,Jagjit Singh,Mirage — Amarjeet Singh @ 6:30 अपराह्न
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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं।

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं।

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम हैं।

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