कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 16, 2006

दोस्त बन बन के मिले मुझको मिटानेवाले


दोस्त बन बन के मिले मुझको मिटाने वाले
मैं ने देखे हैं कई रंग बदलने वाले

तुमने चुप रहकर सितम और भी ढाया मुझ पर
तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हंसनेवाले

(सितम : injustice)

मैं तो इख़लाक़ के हाथों ही बिका करता हूं
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकनेवाले

(इख़लाक : good nature)

आख़री बार सलाम-ए-दिल-ए-मुज़्तर ले लो
फिर ना लौटेंगे शब-ए-हिज्र पे रोनेवाले

(आख़री : last; सलाम-ए-दिल-ए-मुज़्तर : salutation from the distressed heart)

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1 टिप्पणी »

  1. Hey thanks for posting it.
    I love this ghazals.
    Jagjit Singh Ji is number one.

    टिप्पणी द्वारा Preeti — मार्च 31, 2007 @ 3:28 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया


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