कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 16, 2006

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो


ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी।
मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।

मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा,
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा,
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी।

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना,
वो झूलों से गिरना, वो गिर के सँभलना,
वो पीतल के छल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना,बना के मिटाना,
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी,

वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी,
न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी।

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8 टिप्पणियाँ »

  1. I really love this nazm.

    टिप्पणी द्वारा Vikrant — दिसम्बर 19, 2006 @ 10:33 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  2. This Song is very sweet and My friends also love this song

    टिप्पणी द्वारा charu — मार्च 6, 2007 @ 4:07 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  3. combination of URDU poetry and jagjit is just perfect.

    टिप्पणी द्वारा Preeti — मार्च 31, 2007 @ 3:35 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  4. hey these lines are really touchy. thanx for such a blog!
    ‘न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
    बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी।’
    kitne achche lines hain ye

    टिप्पणी द्वारा monika minal — जून 1, 2007 @ 4:30 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  5. hi paramjeet
    please edit dis line.
    वो पीपल के पल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
    actually it is

    wo peetal ke challon ke pyaare se tohfe.

    टिप्पणी द्वारा Gaurav Srivastava — अगस्त 9, 2007 @ 12:09 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  6. it really really nice

    टिप्पणी द्वारा meraj — सितम्बर 14, 2007 @ 11:43 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  7. yeh gajal college ki canteen main bhaith ker
    khoob suntain thain. sunanai wala ek dost tha Rajesh. patta nain ab kaha gya.

    टिप्पणी द्वारा DANNY — फ़रवरी 13, 2009 @ 2:35 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  8. ये गजल जब भी मेँ सुनता हूँ तब महसूस करता हूं कि मेरे बचपन को ही जगजीत सिँहजी ने लिखा है जैसा लिखा वैसा मेरा बचपन गुजरा जगजीत सिंहजी आपका हर गीत अतीत की सत्यता को प्रकट करता है

    टिप्पणी द्वारा हरविजय सिंह भदौरिया — अक्टूबर 20, 2010 @ 8:23 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया


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