कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

नवम्बर 2, 2006

तेरी सूरत जो भरी रहती है आँखों में सदा


तेरी सूरत जो भरी रहती है आँखों में सदा
अजनबी चेहरे भी पहचाने से लगते हैं मुझे
तेरे रिश्तों में तो दुनियाँ ही पिरो ली मैने

एक से घर हैं सभी एक से हैं बाशिन्दे
अजनबी शहर मैं कुछ अजनबी लगता ही नहीं
एक से दर्द हैं सब एक से ही रिश्ते हैं

उम्र के खेल में इक तरफ़ा है ये रस्सकशी
इक सिरा मुझको दिया होता तो कुछ बात भी थी
मुझसे तगडा भी है और सामने आता भी नहीं

सामने आये मेरे देखा मुझे बात भी की
मुस्कुराये भी पुराने किसी रिश्ते के लिये
कल का अखबार था बस देख लिया रख भी दिया

वो मेरे साथ ही था दूर तक मग़र एक दिन
मुड के जो देखा तो वो और मेरे पास न था
जेब फ़ट जाये तो कुछ सिक्के भी खो जाते हैं

चौधंवे चाँद को फ़िर आग लगी है देखो
फ़िर बहुत देर तलक आज उजाला होगा
राख हो जायेगा जब फ़िर से अमावस होगी

जाना है जाना है चलते ही जाना है

Filed under: Albums,कसक,गज़ल,जगजीत सिहँ,Ghazal,Jagjit Singh,Kasak — Amarjeet Singh @ 1:59 अपराह्न

जाना है जाना है चलते ही जाना है
ना कोई अपना है ना ही ठिकाना है
सब रास्ते नाराज़ हैं
मन्ज़िल की आहटों से राही बेगाना है
जाना है जाना है चलते ही जाना है

क्या कभी साहिल भी तूफ़ान में बहते हैं
सब यहाँ आसान है हौसले कहते हैं
शोलों पे कांटों पे हँस के चल सकते हैं

अपनी तक्दीरों को हम बदल सकते हैं
बिगडे हालातों में दिल को समझाना है
जाना है जाना है चलते ही जाना है

ख्वाबों की दुनिया में यादों के रेले में
आदमी तन्हा है भीड में मेले में
ज़िन्दगी में ऐसा मोड भी आता है

पाँव रुक जाते हैं वक़्त थम जाता है
ऐसे में तो मुश्किल आगे बढ पाना है
जाना है जाना है चलते ही जाना है

याद नहीं क्या क्या देखा था


याद नहीं क्या क्या देखा था सारे मंज़र भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना भी घर भूल गये,

ख़ूब गये परदेस कि अपने दीवार-ओ-दर भूल गये,
शीशमहल ने ऐसा घेरा मिट्टी के घर भूल गये,

तुझको भी जब अपनी क़समें अपने वादे याद नहीं,
हम भी अपने ख़्वाब तेरी आँखों में रखकर भूल गये,

मुझको जिन्होने क़त्ल किया है कोई उन्हे बतलाये ”नज़ीर”,
मेरी लाश के पहलू में वो अपना ख़न्जर भूल गये,

Lyrics: Nazir Bakri
Singer: Jagjit Singh

कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाये


कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाये
तुम्हारे नाम की इक ख़ूबसूरत शाम हो जाये

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाये
चरागों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाये

अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर
मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाये

समंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको
हवायें तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाये

मै ख़ुद भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ
कोई मासूम क्यों मेरे लिये बदनाम हो जाये

मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा
परिंदा आसमाँ छूने में जब नाक़ाम हो जाये

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
ना जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये

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