कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

दिसम्बर 27, 2006

मै चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले


मै चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही करीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले

माज़ी == past
औराक़ == pages
सफ़हा == page

आते आते मेरा नाम सा रह गया

Filed under: Albums,गज़ल,जगजीत सिहँ,Ghazal,Jagjit Singh,Live with Jagjit Singh — Amarjeet Singh @ 12:59 अपराह्न

आते आते मेरा नाम सा रह गया
उसके होंठों पे कुछ कांपता रह गया

वो मेरे सामने ही गया और मै
रास्ते की तरह देखता रह गया

झूठवाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मै था के सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे ना थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया

दिसम्बर 20, 2006

उम्र जलवों में बसर हो

Filed under: Albums,गज़ल,जगजीत सिहँ,Ghazal,Jagjit Singh,Live at Wembley — Amarjeet Singh @ 12:02 अपराह्न

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं,
हर शब-ए-गम की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं,

चश्म-ए-साकी से पियो या लब-ए-सगर से पियो,
बेखुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं,

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है,
उनकी आगोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं,

शेख करता तो है मस्ज़िद में खुदा को सज़दे,
उसके सज़दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं,

सबकी नज़रों में हो साकी ये ज़रूरी है मगर,
सब पे साकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं,

ये शीशे ये रिश्ते

Filed under: Albums,गज़ल,जगजीत सिहँ,Films,Ghazal,Jagjit Singh,Khudai — Amarjeet Singh @ 11:54 पूर्वाह्न

ये शीशे ये सपने ये रिश्ते यह धागे,
किसे क्या खबर है कहां टूट जायें,

मोहब्बत के दरिया मे तिनके वफ़ा के,
न जाने यह किस मोड पर डूब जायें,

अजब दिल की वादी अजब दिल की बस्ती,
हर एक मोड मौसम नयी ख्वाइशों का,

लगाये हैं हमने यह सपनों के पौधे,
मगर क्या भरोसा यहां बारिशों का,

मुरादों की मंज़िल के सपनों मे खोये,
मोहब्बत की राहों पे हम चल पडे थे,

ज़रा दूर चल कर जब आंखे खोला तो,
कडी धूप मे हम अकेले खडे थे,

जिन्हे दिल से चाहा जिन्हें दिल से पूजा,
नज़र आ रहे हैं वोही अजनबी से,

रवायत है शायद यह सदियों पुरानी,
शिकायत नही है कोई ज़िन्दगी से,

तमन्ना फ़िर मचल जाये


तमन्ना फ़िर मचल जाये,
अगर तुम मिलने आ जाओ,
यह मौसम ही बदल जाये,
अगर तुम मिलने आ जाओ,

मुझे गम है कि मैने,
ज़िन्दगी मे कुछ नहीं पाया,
यह गम दिल से निकल जाये,
अगर तुम मिलने आ जाओ,

नहीं मिलते हो मुझसे तुम,
तो सब हमदर्द हैं मेरे,
ज़माना मुझसे जल जाये,
अगर तुम मिलने आ जाओ,

यह दुनिया भर के झगडे,
घर के किस्से काम की बातें,
बला हर एक टल जाये,
अगर तुम मिलने आ जाओ

बेनाम सा ये दर्द


बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नही जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नही जाता,

सब कुछ तो है क्या ढूंढती हैं ये निगाहें,
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यों नहीं जाता,

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहां मे,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नही जाता,

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यों नहीं जाता,

वो नाम जो बरसो से ना चेहरा ना बदन है,
वो ख्वाब अगर है तो बिखर क्यों नहीं जाता

दिसम्बर 19, 2006

सोचा नहीं अच्छा-बुरा


सोचा नहीं अच्छा-बुरा, देखा-सुना कुछ भी नहीं..
मांगा खुदा से रात-दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं..

देखा तुझे, सोचा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे..
मेरी खता मेरी वफ़ा, तेरी खता कुछ भी नहीं..

जिस पर हमारी आंख ने मोती बिछाये रात-भर..
भेजा वोही कागज़ उन्हे, लिखा मगर कुछ भी नहीं..

एक शाम की दहलीज पर, बैठे रहे वो देर तक..
आंखों से की बातें बहुत, मुह से कहा कुछ भी नहीं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं


हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

निगाह-ए-दिल की येही आखिरी तमन्ना है..
तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये मे शाम करता चलूं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
उन्हे येह ज़िद है कि मुझे देखकर किसी और को ना देख..

मेरा येह शौक, कि सबसे कलाम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

ये मेरे ख्वाबों की दुनिया नहीं, सही..
अब आ गया हूं तो दो दिन कयाम करता चलूं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

वो दिल ही क्या जो तेरे मिलने की दुआ ना कर

Filed under: Albums,गज़ल,जगजीत सिहँ,Ghazal,Jagjit Singh,The Gold Disc — Amarjeet Singh @ 3:13 अपराह्न

वो दिल ही क्या जो तेरे मिलने की दुआ ना करे..
मैं तुझको भूल के ज़िन्दा रहूं, ये खुदा ना करे..

रहेगा साथ, तेरा प्यार, ज़िन्दगी बन कर..
ये और बात, मेरी ज़िन्दगी अब वफ़ा ना करे..

ये ठीक है माना, नहीं मरता कोई जुदाई में..
खुदा किसी को, किसी से जुदा ना करे..

सुना है उसको मोहब्ब्त दुआयें देती है..
जो दिल पे चोट तो खाये, पर गिला ना करे..

ज़माना देख चुका है, परख चुका है उसे..
“कातिल” जान से जाये, पर इल्तिजा ना करे..

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