कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

दिसम्बर 19, 2006

सोचा नहीं अच्छा-बुरा


सोचा नहीं अच्छा-बुरा, देखा-सुना कुछ भी नहीं..
मांगा खुदा से रात-दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं..

देखा तुझे, सोचा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे..
मेरी खता मेरी वफ़ा, तेरी खता कुछ भी नहीं..

जिस पर हमारी आंख ने मोती बिछाये रात-भर..
भेजा वोही कागज़ उन्हे, लिखा मगर कुछ भी नहीं..

एक शाम की दहलीज पर, बैठे रहे वो देर तक..
आंखों से की बातें बहुत, मुह से कहा कुछ भी नहीं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं


हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

निगाह-ए-दिल की येही आखिरी तमन्ना है..
तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये मे शाम करता चलूं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
उन्हे येह ज़िद है कि मुझे देखकर किसी और को ना देख..

मेरा येह शौक, कि सबसे कलाम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

ये मेरे ख्वाबों की दुनिया नहीं, सही..
अब आ गया हूं तो दो दिन कयाम करता चलूं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

वो दिल ही क्या जो तेरे मिलने की दुआ ना कर

Filed under: Albums,गज़ल,जगजीत सिहँ,Ghazal,Jagjit Singh,The Gold Disc — Amarjeet Singh @ 3:13 अपराह्न

वो दिल ही क्या जो तेरे मिलने की दुआ ना करे..
मैं तुझको भूल के ज़िन्दा रहूं, ये खुदा ना करे..

रहेगा साथ, तेरा प्यार, ज़िन्दगी बन कर..
ये और बात, मेरी ज़िन्दगी अब वफ़ा ना करे..

ये ठीक है माना, नहीं मरता कोई जुदाई में..
खुदा किसी को, किसी से जुदा ना करे..

सुना है उसको मोहब्ब्त दुआयें देती है..
जो दिल पे चोट तो खाये, पर गिला ना करे..

ज़माना देख चुका है, परख चुका है उसे..
“कातिल” जान से जाये, पर इल्तिजा ना करे..

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