कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

दिसम्बर 27, 2006

मै चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले


मै चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही करीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले

माज़ी == past
औराक़ == pages
सफ़हा == page

आते आते मेरा नाम सा रह गया

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आते आते मेरा नाम सा रह गया
उसके होंठों पे कुछ कांपता रह गया

वो मेरे सामने ही गया और मै
रास्ते की तरह देखता रह गया

झूठवाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मै था के सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे ना थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया

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