कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

सितम्बर 19, 2007

फिर नज़र से पिला दीजिये


फिर नज़र से पिला दीजिये,
होश मेरे उड़ा दीजिये,
छोडिये बर्ह्मी की रविश,
अब जरा मुस्कुरा दीजिये,
बात अफसाना बन जायेगी,
इस कदर मत हवा दीजिये,
आए खुलके मिलिये गले,
सब तकलुफ हटा दीजिये,
कब से मुश्ताके दीदार हु,
अब तो जलवा दिखा दीजिये,

तेरा चेहरा है आईने जैसा


तेरा चेहरा है आईने जैसा,
क्यो न देखू है देखने जैसा,

तुम कहो तो मैं पूछ लू तुमसे,
है सवाल एक पूछने जैसा,

दोस्त मिल जायेगे कई लेकिन,
न मिलेगा कोई मेरे जैसा,

तुम अचानक मिले थे जब पहले,
पल नही है वो भूलने जैसा,

काँटों से दामन उल्झाना मेरी आदत है


काँटों से दामन उल्झाना मेरी आदत है,
दिल मे पराया दर्द बसना मेरी आदत है,
मेरा गला अगर कट जाए तो मुझ पर क्या इल्जाम,
हर कातिल को गले लगना मेरी आदत है,
जिन को दुनिया ने ठुकराया जिन से है सब दूर,
एसे लोगो को अपनाना मेरी आदत है,
सब की बातें सुन लेता हु में चुप चाप मगर,
अपने दिल की करते जन मेरी आदत है,

घर से निकले थे हौसला करके


घर से निकले थे हौसला करके,
लौट आए खुदा खुदा करके,
हमने देखा है तज्रुबा करके,
जिन्दगी तो कभी नही आए,
मौत आए जरा जरा करके,
लोग सुनते रहे दिमाग की बात,
हम चले दिल को रहनुमा करके,
किसने पाया सुकून दुनिया मे,
ज़िन्दगानी का सामना करके,

मुस्कुरा कर मिला करो हमसे


मुस्कुरा कर मिला करो हमसे,
कुछ कहा और सुना करो हमसे,

बात करने से बात बढती है,
रोज बाते किया करो हमसे,

दुश्मनी से मिलेगा क्या तुमको,
दोस्त बनकर रहा करो हमसे,

देख लेते है सात पर्दो मे,
यु न परदा किया करो हमसे

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