कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 31, 2007

बहुत खूबसूरत है आँखे तुम्हारी


बहुत खूबसूरत है, आँखे तुम्हारी,
अगर हो इनयात, ऐ जाने मोहब्बत,
गारा देगी ये दिल को, किस्मत हमारी,

जो सबसे जुदा है, वो अंदाज़ हो तुम,
छुपा था जो दिल मे, वो ही राज़ हो तुम,

तुम्हारी नजाकत, बनी जबसे चाहत,
सुकून बन गई है, हर एक बेकरारी,

न थे जब तलक तुम, हमारी नजर में,
न था चाँद शब में, न सूरज सहर में,

तुम्हारी इजाज़त, तुम्हारी हुकूमत,
ये सारा गगन है, ये धरती है सारी,

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अक्टूबर 30, 2007

यूं तो गुज़र रहा है हर इक पल खुशी के साथ


यूं तो गुज़र रहा है, हर इक पल खुशी के साथ,
फिर भी कोई कमी सी है, क्यों ज़िंदगी के साथ,

रिश्ते वफाये दोस्ती, सब कुछ तो पास है,
क्या बात है पता नही, दिल क्यों उदास है,
हर लम्हा है हसीन, नई दिलकशी के साथ,

चाहत भी है सुकून भी है दिल्बरी भी है,
आखों में खवाब भी है, लबो पर हसी भी है,
दिल को नही है कोई, शिकायत किसी के साथ,

सोचा था जैसा वैसा ही जीवन तो है मगर,
अब और किस तलाश में बैचैन है नज़र,
कुदरत तो मेहरबान है, दरयादिली के साथ,

रात खामोश है चाँद मदहोश है


रात खामोश है चाँद मदहोश है,
थाम लेना मुझे जा रहा होश है,

मिलन की दास्ताँ धडकनों की जुबान,
गा रही है ज़मीन सुन रहा आसमान,

गुनगुनाती हवा दे रही है सदा,
सर्द इस रात की गर्म आगोश है,

महकती यह फिजा जैसे तेरी अदा,
छा रहा रूह पर जाने कैसा नशा,

झूमता है जहाँ अजब है यह समां,
दिल के गुलज़ार मे इश्क पुरजोश है,

अक्टूबर 29, 2007

यह किसका तस्सवूर है


यह किसका तस्सवूर है, यह किसका फ़साना है,
जो अश्क है आखों में तस्बीह का दाना है,

जो उन पे गुज़रती है, किसने उसे जन है,
आपनी ही मुसीबत है, आपना ही फ़साना है,

आखो में नमी सी है, चुप चुप से वो बैठे है,
नाजुक सी निगाहों में, नाजुक सा फ़साना है,

ये इश्क नही आसन, इतना तो समज लीजिये,
इक आग का दरिया है, और डूब के जाना है,

या वो थे खफा हमसे, या हम है खफा उनसे,
कल उनका जमाना था, आज अपना जमाना है,

तस्बीह का दाना : Bead
तस्सवूर : Contemplation, Fancy, Fantasy, Idea, Imagine, Imagination, Opinion, Thought, Visualise

अक्टूबर 27, 2007

गुम सुम ये जहाँ है


गुम सुम ये जहाँ है, हमदम तू कहाँ है,
गम्ज़दा हो गई, ज़िंदगी आ भी जा,

रात बैठी है बाहे पसारे, सिस्किया ले रहे है सितारे,
कोई टुटा हुआ दिल पुकारे, हमदम तू कहाँ है,

आज आने का वादा भुला कर, नाउमीदी की आंधी चला कर,
आशियाना वफ़ा का जला कर, हमदम तू कहाँ है,

यूँ तो जाते हुए मैंने उसे रोका भी नही


यूँ तो जाते हुए मैंने उसे रोका भी नही,
प्यार उस से न रहा हो मुझे, ऐसा भी नही,

मुझको मंजिल की कोई फ़िक्र नही है य रब,
पर भटकता ही रहू जिस पे, वो रास्ता भी नही,

मुन्तजिर मे भी किसी शाम नही था उसका,
और वादे पे कभी शख्स वो आया भी नही,

जिसकी आहट पे निकल पड़ता था कल सीने से,
देख कर आज उसे दिल मेरा धड़का भी नही,

जवाब जिनका नही वो सवाल होते है


जवाब जिनका नही वो सवाल होते है,
जो देखने में नही कुछ, कमाल होते है,

तराश्ता हूँ तुझे जिन में अपने लफ्जों से,
बहुत हसीन मेरे वो ख्याल होते है,

हसीन होती है जितनी बला की दो आँखें,
उसी बला के उन आंखों में जाल होते हैं,

वह गुनगुनाते हुए, यूँही, जो उठाते है,
क़दम कहाँ, वो क़यामत की चाल होते हैं,

अक्टूबर 26, 2007

ज़िंदगी यूँ हुयी बसर तन्हा


ज़िंदगी यूँ हुयी बसर तन्हा,
काफिला साथ और सफर तन्हा,

अपने साये से चौंक जाते हैं,
उम्र गुजरी है इस कदर तन्हा,

रात भर बोलते हैं सन्नाटे,
रात काटे कोई किधर तन्हा,

दिन गुज़रता नहीं है लोगो में,
रात होती नहीं बसर तन्हा,

हमने दरवाज़े तक तो देखा था,
फ़िर न जाने गए किधर तन्हा,

वो ख़त के पुर्जे उडा रहा था


वो ख़त के पुर्जे उडा रहा था,
हवाओं का रूख दिखा रहा था,

कुछ और भी हो गया नुमाया,
मैं अपना लिखा मिटा रहा था,

उसी का इमा बदल गया है,
कभी जो मेरा खुदा रहा था,

वो एक दिन एक अजनबी को,
मेरी कहानी सुना रहा था,

वो उम्र कम कर रहा था मेरी,
मैं साल अपने बढ़ा रहा था,

शाम से आँख में नमी सी है


शाम से आँख में नमी सी है,
आज फ़िर आपकी कमी सी है,

दफ़न कर दो हमें की साँस मिले,
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है,

वक्त रहता नहीं कहीं छुपकर,
इसकी आदत भी आदमी सी है,

कोई रिश्ता नहीं रहा फ़िर भी,
एक तस्लीम लाज़मी सी है,

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