कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 4, 2007

दिल में अब दर्द-ऐ-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं


दिल में अब दर्द-ऐ-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं,
जिन्दगी मेरी इबादत के सिवा कुछ भी नहीं,

मैं तेरी बारगाह-ऐ-नाज़ में क्या पेश करूं,
मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं,

ऐ खुदा मुझ से न ले मेरे गुनाहों का हिसाब,
मेरे पास अश्क-ऐ-नदामत के सिवा कुछ भी नहीं,

वोह तो मिट कर मुझे मिल ही गयी राहत वर्ना,
जिन्दगी रंज-ओ-मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं,

धुआं बनाके फिजां में उड़ा दिया मुझको


धुआं बनाके फिजां में उड़ा दिया मुझको,
मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको,

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए,
सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझको,

सफेद रंग की चादर लपेट कर मुझ पर,
फसीने शहर से किसी ने सजा दिया मुझको,

मैं एक ज़रा बुलंदी को छूने निकला था,
हवा ने थम के ज़मीन पर गिरा दिया मुझको,

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह


दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह,
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह,

मैंने तुझ से चाँद सितारे कब मांगे,
रोशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह,

सूरज सी एक चीज़ तो हम सब देख चुके,
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह,

या धरती के ज़ख्मों पर मरहम रखदे,
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह,

जिन्दगी तुझको जिया है कोई अफ़सोस नहीं


जिन्दगी तुझको जिया है कोई अफ़सोस नहीं,
ज़हर ख़ुद मैंने पिया है कोई अफ़सोस नहीं,

मैंने मुजरिम को भी मुजरिम न कहा दुनिया में,
बस यही जुर्म किया है कोई अफ़सोस नहीं,

मेरी किस्मत में जो लिखे थे उन्ही काँटों से,
दिल के ज़ख्मों को सीया है कोई अफ़सोस नहीं,

अब गिरे संग के शीशों की हूँ बारिश ‘फाकिर’,
अब कफ़न ओढ़ लिया है कोई अफ़सोस नहीं,

शायद मैं जिन्दगी की सहर ले के आ गया


शायद मैं जिन्दगी की सहर ले के आ गया,
कातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया,

ता उम्र धुंद्ता रहा मंज़िल मैं इश्क की,
अंजाम ये के गरदे सफर ले के आ गया,

नश्तर है मेरे हाथ में कंधों पे मयकदा,
लो मैं इलाजे दर्द-ऐ-जिगर ले के आ गया,

‘फाकिर’ सनम मयकदे में न आता मैं लौटकर,
इक ज़ख्म भर गया था इधर ले के आ गया,

ला पिला दे शराब ऐ साकी


ढल गया आफताब ऐ साकी,
ला पिला दे शराब ऐ साकी,

या सुराही लगा मेरे मुँह से,
या उलट दे नकाब ऐ साकी,

मैकदा छोड़ कर कहाँ जाऊं,
है ज़माना ख़राब ऐ साकी,

जाम भर दे गुनाहगारों के,
ये भी है इक सवाब ऐ साकी,

आज पीने दे और पीने दे,
कल करेंगे हिसाब ऐ साकी,

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