कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 4, 2007

शायद मैं जिन्दगी की सहर ले के आ गया


शायद मैं जिन्दगी की सहर ले के आ गया,
कातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया,

ता उम्र धुंद्ता रहा मंज़िल मैं इश्क की,
अंजाम ये के गरदे सफर ले के आ गया,

नश्तर है मेरे हाथ में कंधों पे मयकदा,
लो मैं इलाजे दर्द-ऐ-जिगर ले के आ गया,

‘फाकिर’ सनम मयकदे में न आता मैं लौटकर,
इक ज़ख्म भर गया था इधर ले के आ गया,

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