कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 17, 2007

दैरो हरम मैं बसने वालो


दैरो हरम मैं बसने वालो,
मए खानों में फुट न डालो,

तूफान से हम टकराएँगे,
तुम अपनी कश्ती को संभालो,

मएखाने में आए वायेज़,
इन को भी इन्सान बना लो,

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो,
ताजमहल पे रंग न डालो,

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2 टिप्पणियाँ »

  1. धन्यवाद.

    “आरिज़-ओ-लब” मतलब?

    टिप्पणी द्वारा तो — अक्टूबर 18, 2007 @ 11:23 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  2. Waah

    Jo patthar se takrayenge
    kya phoolon se ghabrayenge.

    aur bhi padne ki icha se
    Devi

    टिप्पणी द्वारा Devi Nangrani — अक्टूबर 20, 2007 @ 9:42 अपराह्न | प्रतिक्रिया


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