कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 26, 2007

शाम से आँख में नमी सी है


शाम से आँख में नमी सी है,
आज फ़िर आपकी कमी सी है,

दफ़न कर दो हमें की साँस मिले,
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है,

वक्त रहता नहीं कहीं छुपकर,
इसकी आदत भी आदमी सी है,

कोई रिश्ता नहीं रहा फ़िर भी,
एक तस्लीम लाज़मी सी है,

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2 टिप्पणियाँ »

  1. Sir Ji…..gr8 Job….

    थोड़ा सा correction है 3rd para mein, “छुपकर” नहीं “रूककर”

    टिप्पणी द्वारा Tarun Srivastava — मार्च 3, 2010 @ 10:36 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  2. sir ji…tasleem ki jagah tasveer hai shayad

    टिप्पणी द्वारा manish — सितम्बर 22, 2010 @ 8:33 अपराह्न | प्रतिक्रिया


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