कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

नवम्बर 15, 2007

जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं


जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं,
हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं,

उन पे तूफान को भी अफ़सोस हुआ करता है,
वो सफिने जो किनारों पे उलट जाते हैं,

हम तो आए थे रहें साख में फूलों की तरह,
तुम अगर हार समझते हो तो हट जाते हैं,

झुकी झुकी सी नज़र बेकरार है के नही


झुकी झुकी सी नज़र बेकरार है के नही,
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है के नही,

तू अपने दिल की जवाँ धडकनों को गिन के बता,
मेरी तरह तेरा दिल बेकरार है के नही,

वो पल के जिस में मोहब्बत जवाँ होती है,
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है के नही,

तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को,
तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है के नही,

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो


तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,
क्या गम है जिसको छुपा रहे हो,

आंखो में नमी हँसी लबो पर,
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो,

बन जायेंगे ज़हर पीते पीते,
ये अश्क जो पीते रहे हो,

जिन ज़ख्मों को वक्त भर चला है,
तुम क्यूं उन्हें छेड़े जा रहे हो,

रेखाओं का खेल है मुक्क़द्दर,
रेखाओं से मात खा रहे हो,

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